भारत का संघवाद: क्या अब संरचनात्मक सुधार की ज़रूरत है?

भारत का संघीय ढांचा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बँटवारे, वित्तीय स्वायत्तता और संवैधानिक भूमिकाओं को लेकर कई सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत के संघवाद को एक “structural reset” की आवश्यकता है।
संघवाद का मूल सिद्धांत यह है कि केंद्र और राज्य परस्पर सहयोग के साथ शासन करें। लेकिन हालिया घटनाक्रमों में यह देखा गया है कि नीति-निर्माण, वित्तीय संसाधनों के आवंटन और संवैधानिक प्रक्रियाओं में संतुलन को लेकर असहमति बढ़ी है। इससे सहकारी संघवाद की भावना कमजोर पड़ती दिख रही है।
विशेष रूप से राज्य विधेयकों पर राज्यपाल की भूमिका, केंद्र द्वारा वित्तीय निर्णयों में बढ़ती दखल, और राज्यों की सीमित राजकोषीय स्वतंत्रता जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। कई राज्यों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त निर्णय-स्वतंत्रता नहीं मिल पा रही, जबकि केंद्र का तर्क है कि राष्ट्रीय एकता और नीति-समानता आवश्यक है।
संवैधानिक जानकारों के अनुसार, भारत का संघवाद न तो पूरी तरह केंद्रीकृत होना चाहिए और न ही अत्यधिक विकेंद्रीकृत। बदलते सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में केंद्र-राज्य संबंधों की संरचनात्मक समीक्षा और पुनर्संतुलन समय की मांग बन गई है।
आने वाले समय में यह बहस तय करेगी कि भारत का संघीय ढांचा अधिक सहयोगी बनेगा या टकरावपूर्ण। स्पष्ट है कि संघवाद को मजबूत करने के लिए संवाद, विश्वास और संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top